Tuesday, December 1, 2009

वर्जिन प्यार : ऐसा होता है क्या ?

  पता नहीं हिंदी में वर्जिनिटी का सबसे करीबी शब्द कौन सा है? क्योंकि इसके लिए जब हम अविवाहित, अविवाहिता, कुंवारे या कुंवारी शब्द का प्रयोग करते हैं, तो वह भारत या पूरे दक्षिण एशिया में तो मान्य होगा, पर इन शब्दों को चीड़-फाड़ कर देखें तो दोनों के अर्थ काफी दूर हो जाते हैं. लेकिन इन सभी शब्दों का एक कॉमन फैक्टर है; प्यार. हाँ, प्यार के कारण अनेक हो सकते हैं. 
                                                           करीब दो साल पहले काफी चर्चित प्रो. मटुकनाथ का मैं इंटरव्यू कर रहा था. पहले से ही मैंने सोच रखा था कि आज मैं उनसे उगलवा के ही रहूँगा कि इस उम्र में उनके प्रेम के पीछे कहीं-न-कहीं सेक्स महत्वपूर्ण है. लेकिन मैं हैरान रह गया जब दूसरे प्रश्न के जवाब में ही उन्होंने कहा कि बिना सेक्स के प्रेम बेमानी है; सेक्स तो प्रेम का प्रवेश द्वार है और इसे तार्किक रूप से सिद्ध भी कर दिया. मै दोराहे पर खड़ा था. कभी प्रेम, वर्जिनिटी और सेक्स को एक साथ जोड़ता , तो कभी लगता था कि प्यार स्वार्थी क्यों होता है? जब कोई प्यार में पड़ता है तो क्यों अपने साथी से यह अपेक्षा रखता है कि वह उन इमोशंस को किसी और के साथ नहीं बांटे और भावनात्मक रूप से उसी से ही  जुड़ा/जुडी  रहे. क्या यहाँ पर भी नहीं लगता है कि संवेदनाओं से ज्यादा अहम शरीर है, क्योंकि दूसरे संबंधों में भी यह यकीन होने पर ही कि उसके साथी का शरीर पूरी तरह उसका है, वह संतुष्ट रहता है. 
                                                                   खैर,छोड़िए इन दार्शनिक बातों को. उस दिन मटुक जी से बात करने के बाद तो प्लेटोनिक लव का मेरा सारा कांसेप्ट  ही ध्वस्त हो गया. वर्जिनिटी के लिए मैंने कहीं एक और शब्द पढ़ा था-"अक्षत योनी". लीजिए , स्त्री  की  वर्जिनिटी का पैमाना तो मिल गया, लेकिन जब पुरुष के लिए 'वर्जिनिटी' शब्द का इस्तेमाल किया जाता  है, तो इसका हिन्दी अनुवाद क्या होना चाहिए? इस बात पर हम पुरुषों को तो खुश होना ही चाहिए कि स्त्रियों  ने अब तक ऐसे शब्दों का इजाद नहीं किया है जिससे हमें सेक्सुअल स्तर पर शर्मसार होना पड़े. पर, व्यक्तिगत रूप से मुझे स्त्रियों से एक ईर्ष्या तो हमेशा रहती है कि वो माँ बन सकती हैं. इस प्रक्रिया की संवेदनाएं, स्पंदन और एक जीव को रचाने का सारा क्रेडिट उनका होता है, पर मुझे यह सब नहीं मिल सकता.  ज़रा सोचिये न, जब एक ब्लॉग में दस-पंद्रह लाइन लिख कर मानसिक आनंद मिलता है, तो नौ महीने कि उस रचना-प्रक्रिया और उसके बाद का आनंद कैसा होगा?
                                आप सोच रहे होंगे कि कैसी बहकी-बहकी बातें कर रहा है; तभी से फिलोसोफी झाड़ रहा है; ज़रा अपने अन्दर झांक कर तो देखो, क्या तुमने कभी किसी लड़की की वर्जिनिटी के आधार पर उसका चरित्र-चित्रण नहीं किया है?              

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