Tuesday, December 29, 2009

कितनी कठिन है नीतीश की राह ?

कहते हैं राजनीति और प्रशासन में हर समय और हर किसी को खुश नहीं रखा जा सकता। कुछ ऐसा ही नज़ारा है बिहार में। राज्य में विधान सभा चुनाव होने को एक वर्ष से भी कम समय रह गया है और कई ऐसे सवाल हैं जो सत्ताधारी पार्टियों को फ़िर से सत्ता में काबिज होने पर प्रश्नचिह्न लगाते हैं। इसमें भी शक नहीं कि वर्तमान सरकार ने आशातीत कार्य किए हैं, लेकिन जब हम सरकारी आँकड़ों से उसकी तुलना करते हैं, तो आम जनता; जहाँ आज भी करीब 40% लोग निरक्षर हैं, को समझाना सरकार के लिए कठिन होगा। इसके अलावा जदयू और भाजपा के आंतरिक कलह भी अब जगजाहिर हैं।

विकास की बात करें तो वर्तमान सरकार के पास आँकड़ों की कमी नहीं है, पर यह भी सच है कि यह कई बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने में अक्षम रही है। भूख से होने वाली मौतें, नरेगा में भ्रष्टाचार और कई ऐसी अनियमितताएं सरकार को कटघरे में ला खडी करती हैं। वहीं शहरी क्षेत्रों में हुए भौतिक विकास यानी सडक, पानी, बिजली आदि में सुधार सरकार की उपलब्धि कही जा सकती है। लेकिन आज भी 70% जनता गांवों में ही रहती है और वोट डालने का प्रतिशत भी उन्हीं का ज्यादा होता है। शायद यही कारण है कि वर्तमान सरकार ने रामविलास पासवान की दलित राजनीति में सेंध लगाते हुए ‘महादलित’ की श्रेणी में पासवान जाति को छोड कर लगभग सभी दलित जातियों को शामिल कर लिया है। ‘महादलित’ का यह फ़ार्मूला कितना कारगर होता है, यह तो वक्त ही बताएगा, लेकिन इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि वर्तमान सरकार ने बिहार की राजनीतिक जातीय समीकरण को बिगाड़ दिया है। आम सभाओं में विकास के नाम पर मुख्यमंत्री अक्सर वोटरूपी मेहताना मांगते नज़र आते हैं, फ़िर भी जातीय वोट बैंक की कितनी आवश्यकता है, यह इस महीने के घटनाक्रम से साफ़ जाहिर है। पिछले लोक सभा चुनाव के दौरान टिकट नहीं मिलने के कारण नागमणि सिंह जदयू से बाहर हो गए थे। उनके जाने के बाद कोइरी जाति के किसी सक्षम प्रतिनिधि की आवश्यकता थी, जो उपेन्द्र कुशवाहा के पार्टी में शामिल करने से पूरी हो गई। ध्यान देने लायक है कि उपेन्द्र कुशवाहा ने भी कई पार्टियों का भ्रमण करते हुए अंतत: जदयू में आना ही उचित समझा। पिछले साल उन्होंने एक पार्टी की स्थापना भी की थी, जो उनके राजनीतिक प्रहसन का अंतिम दृष्य था।

जहां तक भाजपा और जदयू के ताल-मेल का सवाल है, तो अक्सर भाजपा के नेताओं का आरोप रहता है कि इस सरकार की सारी उपलब्धियां मुख्यमंत्री अपने और अपनी पार्टी के नाम कर देते हैं और जहां भी आरोपों का सामना करना होता है, वहां भजपा को आगे कर दिया जाता है। इस कारण भाजपा की राजनीति में स्थिरता भी नज़र आने लगी है। हलांकि, इसके कई आंतरिक कारण हैं, जिसमें नेताओं का अनेक गुटों में बंटना सर्वप्रमुख है। यही कारण है कि समय-समय पर भाजपा प्रदेश अध्यक्ष को हटाने की भी मांग उठती रही है।

पिछले लोक सभा चुनावों के नतीजे से नीतीश कुमार जिस अतिविश्वास और अतिमहत्वाकांक्षा से लबरेज़ थे, हालिया 17 सीटों के लिए हुए उपचुनाव में सिर्फ़ 3 सीटों पर उनकी पार्टी और 2 सीटों पर भाजपा की जीत ने पानी फेर दिया। इससे यह भी साबित हो गया कि आज भी ग्रामीण इलाकों में रामविलास पासवान और लालू यादव की पकड ढीली नहीं पड़ी है। न्याय के साथ विकास की बात करने वाले मुख्यमंत्री को यह तो सोचना ही होगा कि उनके द्वारा किए जा रहे न्याय और विकास की पहुंच कितनी व्यापक है। क्या वे अपने कार्यों को उन लोगों तक पहुंचाने में सक्षम रहे हैं, जो सही मायने में वोटदाता हैं?

बिहार की राजनीति में क्षेत्रीय राजनीति अपने चरम पर है। पिछले कई वर्षों से यहां कांग्रेस और भाजपा जैसी पार्टियां हाशिए पर नज़र आ रही हैं। हलांकि इस बार अकेले चुनाव लडने के कांग्रेस के फ़ैसले ने पार्टी के लिए उत्प्रेरक का काम तो किया है, लेकिन अभी भी उसे राज्य में एक ऐसे चेहरे की जरूरत है, जो कांग्रेस को फ़िर से जीवंत कर सके। जहां तक भाजपा की प्रांतीय राजनीति का सवाल है,तो इस बात से नकारा नहीं जा सकता कि जदयू ने स्थानीय स्तर पर अपने कद से उसे प्रभावित किया है। पिछले वर्षों के इतिहास को देखते हुए रामविलास पासवान की राजनीति की टोह लेना थोड़ी मुश्किल है। अब तो चुनाव विशेषज्ञ भी मानने लगे हैं अंतिम समय में पासवान किस करवट होंगे, यह कहना कठिन है।

बहरहाल, पिछले चार वर्षों में बिहार के विकास की बात को पूरी तरह खारिज़ नहीं किया जा सकता है। फ़िलवक्त, क्षेत्र विशेष में ही सही नीतीश कुमार की सरकार ने समेकित और समावेशी विकास कि उम्मीद तो जगा ही दी है, जिसके आधार पर जनता उन्हें, एक और मौका दे सकती है।

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